डीटीएनबीडब्ल्यूईडी के बारे में
दत्तोपंत ठेंगड़ी राष्ट्रीय श्रमिक शिक्षा एवं विकास बोर्ड (डीटीएनबीडब्ल्यूईडी), श्रम एवं रोजगार मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन एक स्वायत्त संगठन है। यह श्रमिक शिक्षा एवं विकास के क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त एक अग्रणी राष्ट्रीय संस्था है।
बोर्ड की स्थापना मूल रूप से 16 सितम्बर, 1958 को केंद्रीय श्रमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीडब्ल्यूई) के रूप में की गई थी। श्रम जगत की एक प्रमुख विभूति, महान राष्ट्रवादी, विचारक एवं बुद्धिजीवी श्रद्धेय दत्तोपंत ठेंगड़ी जी से प्रेरणा लेते हुए वर्ष 2016 में इसका नाम परिवर्तित कर दत्तोपंत ठेंगड़ी राष्ट्रीय श्रमिक शिक्षा एवं विकास बोर्ड (डीटीएनबीडब्ल्यूईडी) किया गया। इस नए नाम और स्वरूप के साथ बोर्ड ने अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार करते हुए भारत सरकार की श्रमिक शिक्षा योजना को श्रमिक वर्ग के समग्र विकास के साथ एकीकृत किया है।
‘श्रमेव जयते’ के ध्येय वाक्य तथा ‘किसी राष्ट्र की शक्ति उसके श्रमिकों के कल्याण में निहित होती है’—इस दृढ़ विश्वास के साथ बोर्ड ने अपनी नीतियों, कार्यक्रमों एवं अन्य गतिविधियों को एक ऐसे श्रम पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ बनाने की दिशा में संरेखित किया है, जो निष्पक्ष, समावेशी एवं भविष्य के लिए तैयार कार्य-जगत सुनिश्चित करे और ‘विकसित भारत @ 2047’ की राष्ट्रीय आकांक्षाओं के अनुरूप हो।
भारत का 64 करोड़ सशक्त कार्यबल एक राष्ट्रीय संपदा है। इसी कार्यबल के सामर्थ्य से भारत वर्ष 2047 तक विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और एक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य रखता है। संगठित क्षेत्र के साथ-साथ असंगठित एवं ग्रामीण क्षेत्रों के प्रत्येक श्रमिक तक श्रमिक शिक्षा और विकास की सेवाएँ पहुँचाना अत्यंत चुनौतीपूर्ण एवं निश्चित रूप से एक विशाल कार्य है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बोर्ड केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, उद्योग जगत एवं सामाजिक भागीदारों के समन्वित प्रयासों से श्रमिकों हेतु नवोन्मेषी, प्रौद्योगिकी-सक्षम, विस्तारयोग्य एवं सतत व्यापक जनसंपर्क-आधारित प्रशिक्षण एवं विकास कार्यक्रमों का निरंतर उपयोग कर रहा है, ताकि विकास के लाभ व्यापक और न्यायसंगत रूप से सभी तक पहुँच सकें।
‘श्रम शक्ति नीति’ और नई श्रम संहिताओं से प्रेरित परिवर्तन के इस युग में डीटीएनबीडब्ल्यूईडी कार्य की गरिमा और श्रमिकों के कल्याण को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। साथ ही, यह उद्यमों को विकास करने तथा राष्ट्रीय उत्पादकता एवं समृद्धि में योगदान देने में सक्षम बनाता है। डीटीएनबीडब्ल्यूईडी श्रमिकों की जागरूकता का विस्तार करने, उन्हें रोजगार, उद्योग और शासन से संबंधित सर्वोत्तम कार्य-पद्धतियों से परिचित कराने तथा उत्पादकता एवं गुणवत्ता प्रबंधन, राष्ट्र निर्माण और रचनात्मक ट्रेड यूनियनवाद के विषयों में प्रशिक्षित करने का प्रयास करता है। बोर्ड ने भविष्य के लिए तैयार कार्यबल विकसित करने हेतु देशभर में अनेक नवोन्मेषी कौशल विकास पहल भी प्रारम्भ की हैं। बोर्ड कौशल विकास परियोजनाओं के लिए एक पुरस्कार प्रदान करने वाली संस्था (Awarding Body) के रूप में भी कार्य करता है।
असंगठित क्षेत्र में भी बोर्ड श्रमिकों को उनके अधिकारों, कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों के प्रति जागरूक बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। बोर्ड उन्हें बेहतर आजीविका के लिए शिक्षा एवं कौशल प्रशिक्षण के महत्त्व, डिजिटल एवं वित्तीय साक्षरता, व्यावसायिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा तथा सामाजिक सुरक्षा आदि विषयों पर प्रशिक्षित करता है। बोर्ड श्रम चौकों, श्रमिक बस्तियों, निर्माण स्थलों तथा ऐसे अन्य स्थानों पर विशेष जागरूकता अभियान आयोजित करता है, जहाँ असंगठित क्षेत्र के श्रमिक, प्लेटफॉर्म श्रमिक एवं गिग श्रमिक आदि बड़ी संख्या में एकत्रित होते हैं। इन अभियानों का उद्देश्य ई-श्रम पंजीकरण के माध्यम से असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को औपचारिक व्यवस्था से जोड़ना तथा उन्हें केंद्र और राज्य सरकारों की विभिन्न कल्याणकारी एवं विकास योजनाओं का लाभ दिलाना है।
बोर्ड का संचालन अत्यधिक प्रेरित, समर्पित एवं व्यावसायिक रूप से दक्ष अधिकारियों और कर्मचारियों की टीम द्वारा किया जाता है। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है तथा देशभर में इसके 50 क्षेत्रीय निदेशालयों का व्यापक नेटवर्क कार्यरत है। बोर्ड भारत के प्रत्येक कार्यस्थल तक श्रमिक शिक्षा एवं विकास की सेवाएँ पहुँचाने की भावना के साथ निरंतर कार्य कर रहा है।
1.1.1 श्रमिक शिक्षा का इतिहास
प्राचीन भारत में श्रमिक शिक्षा मुख्यतः व्यावसायिक, व्यावहारिक एवं वंशानुगत स्वरूप की थी। उस समय औपचारिक, शैक्षणिक अथवा संस्थागत शिक्षा के स्थान पर परिवारों और व्यावसायिक संघों के भीतर विशिष्ट कौशलों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित करने पर बल दिया जाता था। यह व्यवस्था तत्कालीन वर्ण-व्यवस्था से गहराई से जुड़ी थी, जिसमें वर्ण अर्थात सामाजिक वर्गीकरण प्रायः व्यक्ति के व्यवसाय का निर्धारण करता था। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तियों को समाज में उनकी विशिष्ट व्यावसायिक भूमिकाओं के लिए तैयार करना था।
प्राचीन भारत में श्रमिक शिक्षा का सबसे सामान्य स्वरूप अपने पिता से कार्य-कौशल सीखना था। इस प्रकार कौशल पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते थे। कभी-कभी युवा श्रमिकों को कार्यस्थल पर प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए किसी कुशल शिल्पकार अथवा गुरु के अधीन प्रशिक्षु के रूप में रखा जाता था। प्राचीन भारत के गुरुकुलों में बौद्धिक अध्ययन के साथ व्यावसायिक प्रशिक्षण अर्थात ‘क्रिया शक्ति’ को सम्मिलित करते हुए समग्र शिक्षा प्रदान की जाती थी, ताकि व्यक्ति आत्मनिर्भर बन सके।
उस समय कृषि, पशुपालन, मृद्भांड निर्माण, काष्ठकला, बुनाई, धातुकर्म और मूर्तिकला जैसे प्रमुख शिल्पों के साथ-साथ आयुर्वेद, शस्त्रविद्या तथा वस्त्र निर्माण से संबंधित कौशल भी सिखाए जाते थे। व्यापारिक एवं शिल्प संघों—महाजनी अथवा श्रेणियों—की भी शिल्पकारों और कारीगरों को संगठित करने, उनके कार्यों को विनियमित करने तथा उन्हें प्रशिक्षित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। प्रशिक्षु शिल्पकार व्यावसायिक कौशलों के साथ व्यापारिक गोपनीयताओं और कार्य-नैतिकता का भी ज्ञान प्राप्त करते थे।
‘शुक्रनीति’ और कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में प्राचीन भारत की श्रमिक शिक्षा के लिए एक व्यापक रूपरेखा प्रस्तुत की गई है। इनमें श्रम प्रबंधन, उचित पारिश्रमिक, श्रमिकों के साथ मानवीय व्यवहार, उनके कल्याण की सुरक्षा, कार्यस्थल की सुरक्षा से संबंधित नियम तथा आर्थिक स्थिरता बनाए रखने और सामाजिक अव्यवस्था रोकने के लिए विवाद समाधान की व्यवस्था पर विशेष बल दिया गया है।
भारत में श्रमिक शिक्षा के वर्तमान स्वरूप का उद्भव 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में समाज सुधारकों द्वारा किए गए कल्याणकारी प्रयासों से हुआ। सी. पी. मजूमदार ने वर्ष 1872 में रात्रि विद्यालय प्रारम्भ किए, जबकि शशिपद बनर्जी ने वर्ष 1870 में बंगाल में ‘वर्किंग मेन्स क्लब’ की स्थापना की। शशिपद बनर्जी ने ‘भारत श्रमजीवी’ नामक समाचार-पत्र भी प्रारम्भ किया, जो श्रमिक वर्ग की पहली भारतीय पत्रिका थी। इसकी प्रसार संख्या अपने चरम पर 15,000 प्रतियों तक पहुँच गई थी, जो उस समय के लिए एक उल्लेखनीय उपलब्धि थी।
ब्रह्म समाज ने वर्ष 1878 में ‘वर्किंग मेन्स मिशन’ की स्थापना की तथा श्रमिकों और वंचित वर्गों के लिए अनेक विद्यालय प्रारम्भ किए। नारायण मेघाजी लोखंडे ने वर्ष 1890 में ‘बॉम्बे मिलहैंड्स एसोसिएशन’ का गठन किया और श्रमिक जागरूकता के लिए वर्ष 1898 में ‘दीनबंधु’ का प्रकाशन किया। नारायण मल्हार जोशी ने वर्ष 1911 में ‘सोशल सर्विस लीग’ की स्थापना की तथा वर्ष 1924 में समाज सेवा और श्रमिक कल्याण के लिए विशेष प्रशिक्षण कक्षाएँ प्रारम्भ कीं।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत की द्वितीय पंचवर्षीय योजना के दौरान योजनाकारों ने अनुभव किया कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में अपेक्षित सामाजिक एवं आर्थिक प्रगति के लिए श्रमिकों की ट्रेड यूनियनों और राष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियों में सक्रिय एवं जागरूक भागीदारी आवश्यक है। एक सशक्त, स्वतंत्र, उत्तरदायी एवं लोकतांत्रिक ट्रेड यूनियन आंदोलन श्रमिकों के जीवन में महत्त्वपूर्ण सुधार ला सकता था। देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में अपनी भूमिका प्रभावी ढंग से निभाने के लिए श्रमिकों को शैक्षणिक प्रशिक्षण की आवश्यकता थी।
यह निर्णय लिया गया कि श्रमिक शिक्षा के माध्यम से श्रमिकों और उनकी यूनियनों को राष्ट्र निर्माण में सार्थक योगदान देने के लिए तैयार किया जाएगा। इसके परिणामस्वरूप भारत सरकार ने वर्ष 1957 में ‘श्रमिक शिक्षा योजना’ तैयार करने के लिए विशेषज्ञों से परामर्श लिया। विशेषज्ञ दल ने मार्च 1957 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसे जुलाई 1957 में भारतीय श्रम सम्मेलन के 15वें अधिवेशन में स्वीकृति प्रदान की गई। सम्मेलन ने भारत में श्रमिक शिक्षा योजना के संचालन हेतु एक स्वायत्त त्रिपक्षीय बोर्ड की स्थापना की अनुशंसा की।
तदनुसार, 16 सितम्बर, 1958 को केंद्रीय श्रमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीडब्ल्यूई) की स्थापना की गई तथा इसे सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के अधिनियम XXI के अंतर्गत पंजीकृत किया गया। वर्ष 1970 में केंद्रीय श्रमिक शिक्षा बोर्ड ने मुंबई में भारतीय श्रमिक शिक्षा संस्थान की स्थापना बोर्ड के शीर्ष प्रशिक्षण संस्थान के रूप में की। इस संस्थान का उद्देश्य केंद्रीय ट्रेड यूनियन संगठनों एवं महासंघों तथा उनसे संबद्ध संघों के प्रतिनिधियों के लिए विशिष्ट श्रमिक शिक्षा पाठ्यक्रमों और संगोष्ठियों का आयोजन करना था।
वर्ष 2016 में महान ट्रेड यूनियन नेता श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी जी के जीवन से प्रेरणा लेते हुए केंद्रीय श्रमिक शिक्षा बोर्ड का नाम बदलकर दत्तोपंत ठेंगड़ी राष्ट्रीय श्रमिक शिक्षा एवं विकास बोर्ड (डीटीएनबीडब्ल्यूईडी) कर दिया गया। बोर्ड ने अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार किया, कौशल विकास पर विशेष ध्यान केंद्रित किया तथा श्रमिक शिक्षा को श्रमिक वर्ग के समग्र विकास के साथ एकीकृत किया।
बोर्ड बहुविषयक एवं बहु-हितधारक दृष्टिकोण अपनाते हुए सहभागिता और साझेदारी के माध्यम से शिक्षा, अनुसंधान एवं प्रशिक्षण पर केंद्रित विविध कार्यक्रमों द्वारा भारत के श्रमिक वर्ग के उत्थान के लिए कार्य करता है। वर्तमान में बोर्ड ट्रेड यूनियनवाद, औद्योगिक शांति, उत्पादकता एवं गुणवत्ता चेतना, सम्मानजनक कार्य, श्रम संहिताओं, मानव संसाधन विकास, रोजगारपरक तकनीकी एवं व्यवहारगत कौशल तथा अन्य संबंधित विषयों पर श्रमिकों में जागरूकता, संवेदनशीलता और क्षमता निर्माण का कार्य कर रहा है। बोर्ड श्रमिकों के कल्याण एवं विकास हेतु सरकार की प्रमुख योजनाओं के अंतर्गत उनका पंजीकरण कराने के लिए व्यापक स्तर पर अभियान भी आयोजित कर रहा है।
1.1.2 श्रमिक शिक्षा की आवश्यकता
भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। डिजिटलीकृत, स्वचालित एवं सतत अर्थव्यवस्था तथा उभरती हुई वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक विकास का एक प्रमुख प्रेरक बनने के लिए तैयार है। अपने जनसांख्यिकीय लाभांश के कारण भारत उन देशों में शामिल है, जो आने वाले वर्षों में विश्व के नए कार्यबल का लगभग दो-तिहाई हिस्सा उपलब्ध कराएँगे। यह तथ्य विश्व आर्थिक मंच की ‘फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट 2025’ में रेखांकित किया गया है।
श्रम एवं रोजगार मंत्रालय, भारत सरकार के अनुसार भारत में रोजगार वर्ष 2017-18 के 47.5 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 64.33 करोड़ हो गया। इस प्रकार छह वर्षों में 16.83 करोड़ रोजगारों की शुद्ध वृद्धि हुई, जो सरकार की युवा-केंद्रित नीतियों और ‘विकसित भारत’ की परिकल्पना के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
भारतीय कार्यबल के संबंध में पत्र सूचना कार्यालय, नई दिल्ली की अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में भारत की 64.2 प्रतिशत जनसंख्या कार्यशील आयु वर्ग में है। आगामी एक दशक तक यह अनुपात लगभग 65 प्रतिशत बने रहने की संभावना है, जिससे भारत को विश्व की सर्वाधिक अनुकूल जनसांख्यिकीय संरचनाओं में से एक प्राप्त होती है।
वर्तमान में भारत में तकनीकी नवाचार, वैश्वीकरण और उपभोक्ता व्यवहार में परिवर्तन के कारण नए उद्योगों एवं रोजगार क्षेत्रों का तीव्र गति से विकास हो रहा है। स्वास्थ्य-देखभाल प्रौद्योगिकी, ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स, वित्तीय प्रौद्योगिकी और शिक्षा प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्र अभूतपूर्व गति से बढ़ रहे हैं। रोजगार बाजार में आकस्मिक श्रमिकों और वेतनभोगी कर्मचारियों, दोनों के पारिश्रमिक में वृद्धि देखी जा रही है। पिछले छह वर्षों में बेरोजगारी दर में उल्लेखनीय कमी आई है, जो उत्पादक रोजगार में कार्यबल के बेहतर समावेशन का संकेत देती है।
अतः भारत के तेजी से विस्तारित होते कार्यबल को देखते हुए श्रमिक शिक्षा केवल उपयोगी ही नहीं, बल्कि एक न्यायसंगत, उत्पादक एवं आधुनिक कार्यबल के निर्माण के लिए अनिवार्य है। विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र के अनेक श्रमिकों को अभी भी अपने अधिकारों, सुरक्षा मानकों और कौशल विकास के अवसरों की पर्याप्त जानकारी नहीं है। वर्तमान श्रम पारिस्थितिकी तंत्र में श्रमिक शिक्षा का महत्त्व निम्नलिखित है:
1. अधिकारों और कानूनों की जानकारी
बड़ी संख्या में श्रमिक वेतन संहिता, 2019 तथा व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य-दशाएँ संहिता, 2020 जैसे कानूनों में उपलब्ध संरक्षण से अनभिज्ञ हैं। श्रमिक शिक्षा उन्हें पारिश्रमिक, कार्य के घंटे, हितलाभ तथा शोषण के विरुद्ध उपलब्ध कानूनी उपायों को समझने में सहायता करती है। इसके माध्यम से वे सरकार की विभिन्न श्रम कल्याण एवं विकास नीतियों, कार्यक्रमों और योजनाओं की जानकारी भी प्राप्त करते हैं।
2. कौशल विकास और रोजगारपरकता
तीव्र औद्योगिक एवं तकनीकी परिवर्तन के कारण श्रमिकों को अपने कौशलों का निरंतर उन्नयन करना आवश्यक है। स्किल इंडिया मिशन, पीएम-विकास और ईपीईपी जैसी सरकारी पहलों का उद्देश्य रोजगारपरकता में सुधार करना है, किंतु इनके प्रति जागरूकता एवं इनमें भागीदारी प्रभावी श्रमिक शिक्षा पर निर्भर करती है।
3. उत्पादकता में वृद्धि
शिक्षित एवं प्रशिक्षित श्रमिक सामान्यतः अधिक कुशल, परिवर्तन के प्रति अनुकूलनशील और नवोन्मेषी होते हैं। इसका लाभ न केवल संबंधित श्रमिकों को, बल्कि उद्योगों और संपूर्ण अर्थव्यवस्था को भी प्राप्त होता है।
4. स्वास्थ्य एवं सुरक्षा संबंधी जागरूकता
कार्यस्थल पर अनेक दुर्घटनाएँ जानकारी के अभाव में होती हैं। शिक्षा के माध्यम से श्रमिक सुरक्षा प्रक्रियाओं, उपकरणों के उचित उपयोग और व्यावसायिक स्वास्थ्य संबंधी उपायों को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं।
5. सामाजिक एवं आर्थिक सशक्तीकरण
श्रमिक शिक्षा आत्मविश्वास, निर्णय लेने की क्षमता तथा ट्रेड यूनियनों एवं सामुदायिक जीवन में भागीदारी को बढ़ावा देती है। डीटीएनबीडब्ल्यूईडी जैसे संगठनों ने इस प्रकार की जागरूकता के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
6. शोषण में कमी
निरक्षरता एवं जानकारी का अभाव श्रमिकों को अनुचित पारिश्रमिक, बंधुआ मजदूरी और खराब कार्य-दशाओं के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है। शिक्षा ऐसे शोषण के विरुद्ध एक प्रभावी सुरक्षा कवच का कार्य करती है।
7. आर्थिक परिवर्तनों के अनुरूप अनुकूलन
वैश्वीकरण और डिजिटलीकरण के कारण श्रमिकों को नई व्यवस्थाओं, प्रौद्योगिकियों एवं रोजगार भूमिकाओं के अनुरूप स्वयं को ढालना आवश्यक है। शिक्षा इस परिवर्तन को सुगम बनाती है और बेरोजगारी के जोखिम को कम करती है।
8. लोकतंत्र का सुदृढ़ीकरण
जागरूक श्रमिकों के लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में भाग लेने, नीतियों को समझने तथा नियोक्ताओं और सरकार से जवाबदेही की अपेक्षा करने की संभावना अधिक होती है।
इस प्रकार भारत में श्रमिक शिक्षा केवल साक्षरता तक सीमित नहीं है; यह सशक्तीकरण, गरिमा और आर्थिक प्रगति का आधार है। राष्ट्रीय एवं समावेशी विकास के लिए प्रशिक्षण, जागरूकता कार्यक्रमों और आजीवन शिक्षण के अवसरों तक श्रमिकों की पहुँच का विस्तार करना अत्यंत आवश्यक है।
1.1.3 हमारी विरासत
केंद्रीय श्रमिक शिक्षा बोर्ड, जिसे अब दत्तोपंत ठेंगड़ी राष्ट्रीय श्रमिक शिक्षा एवं विकास बोर्ड के नाम से जाना जाता है, की विरासत भारत के राष्ट्रीय विकास, श्रमिक जागरूकता के विस्तार, औद्योगिक सौहार्द और जमीनी स्तर की शिक्षा से गहराई से जुड़ी हुई है।
वर्ष 1958 में श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त संस्था के रूप में स्थापित बोर्ड ने छह दशकों से अधिक समय से संगठित, असंगठित एवं ग्रामीण क्षेत्रों के श्रमिकों के बीच ट्रेड यूनियन चेतना, औद्योगिक शांति और सामाजिक उत्तरदायित्व को प्रोत्साहित किया है। भारत में जागरूक एवं उत्तरदायी ट्रेड यूनियनवाद की नींव रखने में बोर्ड ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
बोर्ड की विरासत के प्रमुख पक्ष निम्नलिखित हैं:
1. श्रमिक शिक्षा एवं सशक्तीकरण
बोर्ड ने श्रमिकों, विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को उनके अधिकारों, कर्तव्यों और सामाजिक उत्तरदायित्वों के प्रति शिक्षित करने पर विशेष ध्यान दिया। इससे श्रमिकों को श्रम कानूनों, सुरक्षा उपायों, कल्याणकारी योजनाओं और लोकतांत्रिक भागीदारी को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिली।
2. उत्तरदायी ट्रेड यूनियनवाद को प्रोत्साहन
बोर्ड का उद्देश्य श्रमिकों के बीच से ही रचनात्मक एवं लोकतांत्रिक ट्रेड यूनियन नेतृत्व विकसित करना रहा है। इससे संघर्ष-केंद्रित दृष्टिकोण को कम करने और श्रमिकों एवं प्रबंधन के बीच संवाद को बढ़ावा देने में सहायता मिली।
3. औद्योगिक सौहार्द
प्रशिक्षण कार्यक्रमों, कार्यशालाओं और जागरूकता अभियानों के माध्यम से बोर्ड ने औद्योगिक विवादों को कम करने तथा कार्यस्थलों पर सहयोग एवं सामंजस्य को प्रोत्साहित करने में योगदान दिया।
4. वंचित वर्गों का समावेशन
ग्रामीण श्रमिकों, महिलाओं और समाज के कमजोर वर्गों तक शिक्षा पहुँचाना बोर्ड का एक महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इससे उन्हें श्रम अधिकारों और कल्याण की औपचारिक व्यवस्था से जोड़ने में सहायता मिली।
5. राष्ट्रीय विकास में योगदान
बोर्ड ने श्रमिक शिक्षा को उत्पादकता, सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास जैसे व्यापक राष्ट्रीय लक्ष्यों से जोड़ा, विशेष रूप से भारत की प्रारम्भिक नियोजन अवधि में।
वर्ष 1992 में नई आर्थिक नीति अपनाए जाने के पश्चात भारत ने उदारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण के माध्यम से व्यापक आर्थिक सुधारों की यात्रा प्रारम्भ की। नए औद्योगिक परिवेश में श्रमिक शिक्षा बोर्ड ने कार्यबल को काइज़ेन, गुणवत्ता चक्र, 5-एस और सिक्स सिग्मा जैसी आधुनिक उत्पादकता एवं गुणवत्ता तकनीकों का प्रशिक्षण प्रदान कर महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके साथ ही कार्य-संस्कृति, कार्य-नैतिकता, सामूहिक कार्य, संचार, रचनात्मक निर्णय-निर्माण और संघर्ष प्रबंधन जैसे विषयों पर प्रशिक्षण देकर श्रमिकों के व्यवहारगत कौशलों का भी विकास किया गया।
6. दत्तोपंत ठेंगड़ी राष्ट्रीय श्रमिक शिक्षा एवं विकास बोर्ड के रूप में रूपांतरण
वर्ष 2016 में केंद्रीय श्रमिक शिक्षा बोर्ड का नाम बदलकर दत्तोपंत ठेंगड़ी राष्ट्रीय श्रमिक शिक्षा एवं विकास बोर्ड किया गया। यह परिवर्तन बोर्ड के विस्तारित कार्यक्षेत्र को दर्शाता है, जिसमें पारंपरिक श्रमिक शिक्षा के साथ कौशल विकास और क्षमता निर्माण को भी सम्मिलित किया गया है।
समग्र प्रभाव
श्रमिक शिक्षा बोर्ड की विरासत एक जागरूक एवं सशक्त कार्यबल के निर्माण, श्रमिक-प्रबंधन संबंधों को मजबूत बनाने और श्रमिकों के बीच सामाजिक चेतना को प्रोत्साहित करने में निहित है। समय के साथ बदलती अर्थव्यवस्था और कार्यबल की आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को ढालते हुए बोर्ड आज भी भारत की श्रमिक शिक्षा व्यवस्था की एक प्रमुख संस्था बना हुआ है।